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सदन में मौजूद नहीं थे फिर भी छाए रहे नीतीश कुमार, 90 मिनट की बहस में 50 बार गूंजा नाम

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बिहार विधानसभा सत्र में अनुपस्थित रहने के बावजूद नीतीश कुमार चर्चा के केंद्र में रहे। 90 मिनट की बहस में उनका नाम 50 से ज्यादा बार लिया गया।

पटना/आलम की खबर:बिहार विधानसभा के हालिया सत्र में एक दिलचस्प और असामान्य स्थिति देखने को मिली, जहां पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सदन में मौजूद नहीं थे, लेकिन चर्चा के केंद्र में पूरी तरह बने रहे। करीब डेढ़ घंटे तक चली बहस में उनका नाम बार-बार गूंजता रहा और सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, हर किसी ने अपने-अपने अंदाज में उनका जिक्र किया।

यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का प्रभाव अब भी गहरा है। भले ही वे सदन में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं थे, लेकिन उनके राजनीतिक निर्णय, नीतियां और व्यक्तित्व बहस के केंद्र में रहे।

90 मिनट की बहस, 50 से ज्यादा बार जिक्र

विधानसभा की कार्यवाही के दौरान करीब 90 मिनट तक चली बहस में वक्ताओं ने 50 से अधिक बार नीतीश कुमार का नाम लिया। यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि उनके लंबे राजनीतिक प्रभाव और राज्य की राजनीति में उनकी केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।

विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार एक प्रमुख धुरी रहे हैं। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति में भी उनका जिक्र होना स्वाभाविक है, क्योंकि कई मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां उनके फैसलों और नीतियों से जुड़ी हुई हैं।

सम्राट चौधरी ने बताया ‘गार्जियन’

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन में नीतीश कुमार की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि आज वे जिस पद पर हैं, उसमें नीतीश कुमार की इच्छा शक्ति और मार्गदर्शन का बड़ा योगदान है।

सम्राट चौधरी ने उन्हें ‘गार्जियन’ की तरह बताते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में राज्य ने सुशासन और विकास की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा सरकार उनके द्वारा तय किए गए रास्ते पर आगे बढ़ रही है।

‘सुशासन’ का श्रेय

सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने अपने भाषण में बिहार में स्थापित ‘सुशासन’ की अवधारणा का श्रेय भी नीतीश कुमार को दिया। उनके शासनकाल में लागू की गई योजनाओं और सुधारों का जिक्र करते हुए कहा गया कि राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही है।

यह भी कहा गया कि बिहार के विकास की जो नींव पिछले वर्षों में रखी गई, वह आज भी राज्य की प्रगति का आधार बनी हुई है।

विजय चौधरी ने जताई कमी

उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी अपने संबोधन में नीतीश कुमार की अनुपस्थिति को लेकर भावुक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सदन में उनकी गैरमौजूदगी एक खालीपन का एहसास कराती है।

उन्होंने नीतीश कुमार की तुलना एक ‘दीपक’ से करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन ने राज्य को दिशा दी है और उनकी नीतियों को आगे बढ़ाना सरकार की जिम्मेदारी है।

नीतियों को आगे बढ़ाने का संकल्प

सत्ता पक्ष के नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार द्वारा शुरू की गई नीतियों और विकास योजनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा। उनके कार्यकाल में जो दिशा तय की गई थी, उसी पर चलते हुए राज्य को और आगे ले जाने का संकल्प दोहराया गया।

जदयू के वरिष्ठ नेता श्रवण कुमार ने कहा कि पार्टी के सभी विधायक उनके निर्देशों का पालन कर रहे हैं और सरकार को समर्थन देना उसी का हिस्सा है।

अन्य दलों ने भी किया जिक्र

दिलचस्प बात यह रही कि केवल सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि अन्य दलों के नेताओं ने भी अपने भाषण में नीतीश कुमार का जिक्र किया। विभिन्न दलों के नेताओं ने उनके कार्यकाल, नीतियों और प्रशासनिक शैली पर अपनी राय रखी।

कुछ नेताओं ने उन्हें बिहार का ‘ब्रांड एंबैसडर’ बताया, जबकि कुछ ने उनके शासनकाल में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की सराहना की। इससे यह साफ होता है कि उनकी राजनीति का प्रभाव केवल एक दल तक सीमित नहीं है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

वहीं, विपक्ष ने भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। विपक्षी नेताओं ने कहा कि मौजूदा सरकार को जो जनादेश मिला था, वह काफी हद तक नीतीश कुमार के नाम और छवि पर आधारित था।

उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर सरकार उनके नाम पर बनी है, तो उनकी भूमिका और भागीदारी को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए। विपक्ष ने इस मुद्दे को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाते हुए सरकार पर सवाल खड़े किए।

निष्कर्ष

बिहार विधानसभा का यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि राजनीति में व्यक्तित्व का प्रभाव कितना गहरा हो सकता है। नीतीश कुमार भले ही सदन में मौजूद नहीं थे, लेकिन उनकी राजनीतिक छवि और योगदान ने उन्हें चर्चा के केंद्र में बनाए रखा।

यह स्थिति यह भी बताती है कि बिहार की राजनीति में अभी भी उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी गैरमौजूदगी का राजनीतिक समीकरणों पर क्या असर पड़ता है और क्या यह स्थिति आगे भी बनी रहती है।

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